मराठी भाषा विवाद पर गरमाई राजनीति: राज ठाकरे और निशिकांत दुबे आमने-सामने

मराठी न बोल पाने पर व्यापारियों के साथ मारपीट के बाद राज ठाकरे के विवादित बयान पर बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे का पलटवार। विवाद ने भाषाई अस्मिता और राजनीति का रूप ले लिया है।

Jul 7, 2025 - 19:52
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मराठी भाषा विवाद पर गरमाई राजनीति: राज ठाकरे और निशिकांत दुबे आमने-सामने

मुंबई/नई दिल्ली: महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में बदलता नजर आ रहा है। मराठी न बोलने पर हिंदी भाषी व्यापारियों के साथ कथित मारपीट की घटनाओं ने जहां महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) को निशाने पर ला दिया है, वहीं बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे और राज ठाकरे के बीच तीखी बयानबाज़ी ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है।

क्या है विवाद की जड़?

हाल ही में मुंबई व अन्य शहरी इलाकों से ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जहां हिंदी भाषी व्यापारियों पर मराठी न बोलने के चलते शारीरिक हमला किया गया। इस मुद्दे पर राज ठाकरे ने अपने समर्थकों से कहा,

“बेवजह किसी को मत मारो, लेकिन अगर कोई ज़्यादा ड्रामा करता है तो उसके कान के नीचे एक बजा दो… अगली बार वीडियो मत बनाना।”

राज ठाकरे के इस बयान को उकसावे की राजनीति कहा जा रहा है।

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे का तीखा जवाब

गोड्डा (झारखंड) से सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया और मीडिया से बात करते हुए पलटवार किया:

“अगर आपमें दम है तो महाराष्ट्र से बाहर आइए – बिहार, यूपी, झारखंड या तमिलनाडु में। वहां पटक-पटक कर मारेंगे।”

उन्होंने MNS पर हिंदी भाषियों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा का आरोप लगाया। साथ ही ये भी कहा कि

“मराठी बोलना अनिवार्य बताकर आप संविधान की भावना का अपमान कर रहे हैं।”

राजनीतिक और आर्थिक पहलू पर निशाना

दुबे ने महाराष्ट्र की औद्योगिक स्थिति पर भी सवाल खड़े किए:

“टाटा की पहली फैक्ट्री बिहार में थी, खनिज झारखंड-ओडिशा में हैं, गुजरात में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री है – महाराष्ट्र में क्या है?”

उन्होंने इसे बीएमसी चुनाव को लेकर सस्ती राजनीति करार दिया और तंज कसा कि

“माहिम दरगाह के सामने जाकर उर्दू बोलने वालों पर कार्रवाई करके दिखाएं।”

सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ

इस विवाद ने अब मराठी बनाम हिंदी के पार जाकर भाषायी अस्मिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक ध्रुवीकरण का रूप ले लिया है।

  • राज ठाकरे जहां अपने ‘मराठी मानुष’ एजेंडे को पुनर्जीवित कर रहे हैं,

  • वहीं निशिकांत दुबे इसे “संविधान-विरोधी और अलोकतांत्रिक मानसिकता” करार दे रहे हैं।

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