अछल्दा थाना: महिला सिपाही की इंस्टाग्राम रील्स से मचा बवाल, विभागीय जांच शुरू

औरैया के अछल्दा थाने की महिला सिपाही पॉली भारद्वाज के सोशल मीडिया रील्स वायरल होने के बाद पुलिस विभाग की साख पर सवाल खड़े हो गए हैं। जानिए पूरा मामला और कार्रवाई की स्थिति।

Jun 25, 2025 - 22:36
Jun 25, 2025 - 22:36
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औरैया: उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद स्थित अछल्दा थाना इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वजह है – थाने में तैनात महिला आरक्षी पॉली भारद्वाज की वर्दी में बनाए गए इंस्टाग्राम रील्स, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। इन वीडियो में वह पुलिस स्टेशन के अंदर वर्दी में म्यूजिक और डायलॉग्स पर लिप-सिंक करती नजर आ रही हैं।

इन वीडियो को लेकर न केवल सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है, बल्कि पुलिस विभाग की साख और अनुशासन पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

सोशल मीडिया की दुनिया में सिपाही बनी ‘सेलिब्रिटी’

पॉली भारद्वाज का इंस्टाग्राम अकाउंट उनके असली नाम से संचालित है और उनके फॉलोअर्स की संख्या 2.5 लाख से अधिक है। उनके वीडियो पर लाखों व्यूज आते हैं, और वे सेलिब्रिटी स्टाइल में पोज और एक्टिंग करती दिखाई देती हैं।

हालांकि, इन वीडियो की शूटिंग थाने के अंदर और वर्दी में करना विभागीय नियमों का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।

डीजीपी के निर्देश फिर भी अनदेखी

उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक (DGP) कार्यालय पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि ड्यूटी के दौरान वर्दी में कोई भी सोशल मीडिया रील बनाना सख्त मना है। इसके बावजूद इस तरह की घटनाएं बार-बार सामने आ रही हैं, जो विभागीय नियंत्रण और अनुशासन पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती हैं।

"ड्यूटी" बनाम "डिजिटल पॉपुलैरिटी": एक बढ़ता ट्रेंड

यूपी पुलिस में हालिया भर्ती के बाद सोशल मीडिया पर एक नया ट्रेंड उभर कर सामने आया है, जहां युवा सिपाही अपने प्रोफाइल में ‘COP’, ‘UP Police’, या ‘Singham’-स्टाइल कैप्शन जोड़ रहे हैं। फिल्मी डायलॉग्स, ट्रेनिंग सीन, और विदाई के भावुक रील्स बनाकर कुछ जवान डिजिटल स्टार बनने की होड़ में नजर आ रहे हैं।

कार्रवाई की तैयारी

महिला सिपाही पॉली भारद्वाज के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। उच्चाधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि नियमों का उल्लंघन करने पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

अब सवाल यह है कि क्या पुलिस बल को अपने जवानों के लिए सोशल मीडिया गाइडलाइन स्पष्ट रूप से लागू करनी चाहिए? या फिर समय आ गया है कि "लोक सेवा" और "लोकप्रियता" के बीच स्पष्ट सीमा रेखा खींची जाए?


रिपोर्ट – दीपांशु सावरन

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